होली जीवन के रंग का प्रतीक त्योहार

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Buzzing Chandigarh March,16:(Jay)शीर्षक है – होली जीवन के रंग का प्रतीक त्योहार. होली जीवन में रंग भरने वाला त्योहार.भारतीय संस्कृति, प्रकृति और पर्यावरण से उभरी संस्कृति है। इसके तीज-त्योहार, इसके व्रत और संस्कार सभी पर्यावरण की उपज हैं, भारत के सभी तीज त्योहार या तो मौसम बदलने या ऋतु परिवर्तन के सूचक हैं या फिर खेती और फसल से जुड़े हुये है । हर त्योहार के अपने रंग है और अपना स्वाद । लेकिन सभी त्योहारों में सबसे खूबसूरत त्योहार कि अगर कोई बात करे तो आप आँख मूँद कर कह सकते है कि वह त्योहार है होली।  एक तो होली ऋतु राज बसंत के आगमन का प्रतीक है । सभी मौसमों का राजा बसंत, रंग और उमंग का प्रतीक बसंत और इस बसंत के रंग और उमंग को प्रतिबिम्बित करता उसका प्रतिनिधि त्योहार होली ।
होली क्यूँ सबसे अलग, सबसे खास त्योहार है,  कभी सोचा है आपने ? दरअसल होली रंग मे एकाकार हो जाने का अवसर है, एक ऐसा पल जब हम सभी अपना आस्तित्व खोकर प्रकृति में एकाकार हो जाते है, प्रकृति की छ्टा  के साथ होली के रंग, हम सभी को सिर्फ एक रंग में, रंग देता है । क्या अमीर क्या गरीब, क्या बड़ा क्या छोटा, क्या गोरा क्या काला, क्या बच्चा क्या बूढ़ा, क्या स्त्री क्या पुरुष, सभी रंग- बिरंगे होकर अपनी पहचान कुछ देर के लिए ही सही भुला देते है । और यही इस त्योहार कि सबसे बड़ी उपलब्धि है कि यह सभी को एक में समाहित कर देता है ।
होली का दिन सभी तरह कि वर्जनाओं के टूटने का भी दिन है ।  प्राय: इस त्योहार के बारे में लोगो को एक बड़ी गलतफहमी है कि यह त्योहार, बेहद गंदे और बेहूदेपन का त्योहार है । लोग इसमें फूहड़ता का प्रदर्शन करते है । लेकिन इसके पीछे का मनोविज्ञान शायद हमें पता नहीं है । मनोवैज्ञानिक कहते है कि आमतौर पर हम अपने जीवन में इतनी तरह के कृत्रिम वर्जनाओं को पालकर जीते है, कि हमारे व्यक्तित्व कि स्वाभाविकता नष्ट हो जाती है , हम सभी अपने जीवन में नकलीपन का अभिनय कर रहे होते है , वैसे भी शहरी समाज आपसे, “सोकाल्ड डिप्लोमेटिक” या “पोलिटिकल करेक्ट” होने कि उम्मीद करता है और शहरी समाज, इस पोलिटिकल करेक्ट होने के चक्कर में, अपनी स्वाभाविकता को नष्ट कर देता है । जबकि उसका वास्तविक व्यक्तित्व उससे कुछ और मांग कर रहा होता है। इस तरह जो हम होते है वह दिखा नहीं सकते और जो हम समाज को दिखा रहे होते है वो वास्तविक में हम होते नहीं है । इस तरह दोहरा जीवन जीते-जीते हमारी स्वभविकता नष्ट होने लगती है और हम कई तरह के मानसिक विकार का शिकार हो जाते है ।
होली  दुनियाँ का एक मात्र मनोवैज्ञानिक त्योहार है जो कि उस दिन हमें अपनी हर तरह के वर्जनाओं को तोड़ने कि आजादी देता है , इस दिन आप बुरे हो सकते है, फूहड़ दिख सकते है, उल्टी-सीधी हरकते, कुछ हद तक कर सकते है, जिसका मतलब यह होता है कि इस दिन आप अपने तमाम फसट्रेशन्स को रिलीज कर सके, यह एक तरह का दिमागी उपचार है

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