समृद्धि से सुख का कोई संबंध नहीं:

मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमारजीआलोक

0
31
चंडीगढ ,13 अगस्त: मन को अगर प्रसन्न अवस्था में रखने के लिए प्रयत्न किए जाएं तो हम ज्यादा सुखी रह सकते हैं। तय कीजिए कि आप खुश रहेंगे और खुशी फैलाएंगे। अपने जीवन को आनंद बनाइए ताकि दूसरों को भी आनंद मिले। व्यथा किस बात की। क्या आप जानते हैं, यूरोप की 30 प्रतिशत जनता आज अवसादग्रस्त है, इसके उलट भूटान जैसा छोटा-सा देश सुखी होने के लिए जाना जाता है। यहां तक कि बांग्लादेश में भी कहीं ज्यादा सुखी लोग हैं। तो समृद्धि से सुख का कोई संबंध नहीं है। सुख और शांति तो मन की अवस्था है। आप बहुत थोड़े में भी बहुत सुखी रह सकते हैं जबकि बहुत सारी सुविधाओं के बीच भी आपका मन संतुष्ट नहीं होता। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमारजीआलोक ने ठाणं सूत्र का वाचन करते हुए सैक्टर 24 सी अणुव्रत भवन तुलसी सभागार मे कहे।
मनीषीश्रीसंत ने कहा ध्यान के सहारे आप अपने सुखों को खोज सकते हैं और अगर कोई कष्ट है तो उसका उपाय भी तलाश सकते हैं ध्यान से हमारी सेहत अच्छी होती है, हमारे मन की स्थिति बेहतर होती है और हम सुख पाने की ओर बढ़ते हैं। वह जो भी है, जैसा भी है, जिसे हम यहां-वहां ढूंढ रहे हैं, वह तो हमारे भीतर ही है।
आप जो भी ढूंढ रहे हैं, वह आपके भीतर ही है, और वह प्रकाश, वह आत्मा आपको बहुत प्रेम करती है। इसलिए चिंता मत करिए। अपनी सारी परेशानियां त्याग दीजिए। समस्याओं से मुक्त हो जाइए। उनसे पीछा छुड़ाना कठिन नहीं है। अपनी सारी चिंताएं छोड़ दीजिए, खुश हो जाइए, और खुशी के गीत को फैलाइए। क्या यही हमारे जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए?
मनीषीश्रीसंत ने अंत मे फरमाया अपने आसपास हर एक किसी को झंझोडऩा और उनसे यह कहना, ‘अरे, उठो! हंसो और मुस्कुराओ! हमें अपनी खुशी के दायरे में और लोगों को भी शामिल करना चाहिए और उनकी प्रसन्नता में भी इजाफा करना चाहिए। प्रसन्नता वस्तुओं और सुविधाओं की मोहताज नहीं होती बल्कि हम बहुत साधारण चीजों के साथ भी आनंद से रह सकते हैं। यह विरोधाभास भी दिखलाई देता है कि जब हमारे पास सब होता है-तब भी हम दुखी रहते हैं, और जब हमारे पास कुछ नहीं होता है। इसलिए हम जिस तरह से जीवन को देखते हैं, उसमें जरूर कुछ गलत है। बस यहीं पर हमें वह ज्ञान चाहिए, जिससे हम वापस मुडकर देखें और यह पाएं कि सुख का संबंध इससे नहीं है कि हमारे पास क्या है और क्या नहीं है। बल्कि वह तो हमारे मन की स्थिति पर निर्भर करता है।  मनुष्य के इस दुर्लभ जीवन को धन्य कर देती है आवाज। दुर्वाणी इस महत्वपूर्ण जीवन को सदा-सदा के लिए कलंकित कर देती है। उसी वाणी का प्रयोग कर एक भिखारी भीख मांगता है। एक वाणी का उपयोग कर दुख पाता है, जबकि दूसरा इसके उपयोग से दूसरों के दुख दूर करने में सहायक हो जाता है।  वस्तुत: वाक् अर्थात वाणी एक प्रकार की दुर्लभ साधना है, लेकिन यह जीवन के लिए साधना बने या अभिशाप, यह निर्भर करता है इसके प्रयोक्ता पर। जिस प्रकार सांसारिक मुद्रा का संग्रह कर बाद में उसका उपयोग किसी परमार्थ के उद्देश्य से करने पर वह मानवता के लिए उपयोगी, संग्रहणीय व उपकारी हो जाती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here