समय के साथ आदमी बदलता है मगर जीवन मूल्य नहीं:

मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमारजीआलोक

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Buzzing Chandigarh (Poonam) चंडीगढ़, 21 अगस्त:   समय के साथ आदमी बदलता है मगर जीवन मूल्य नहीं। दायरे और दिशायें बदलती हैं मगर आदर्श तथा उद्देश्य नहीं। बदलने की यह बात जीवन का सापेक्ष दर्शन है। आज वक्त को ऐसे आदमी की प्रतीक्षा है-जो बदलने में विश्वास रखता हो, बदलने के लिए प्रतिज्ञा और प्रयत्न करता हो।
जो यह जानता हो कि बुराइयों की जड़ें दूब-सी कमजोर और शीघ्र फैलने वाली होते हुए भी हमारे सक्षम हाथ उन्हें क्यों नहीं उखाड़ पाते? जो दूषित संस्कृति से स्वयं को अनछुआ रखकर सत्संस्कारों की परम्परा को पीढिय़ों तक पहुंचाता हो। जो मौलिकता और निर्भयता के साथ समय पर सही दिशा में सोचता हो, यही निर्णय लेता हो, क्रियान्विति में सक्रियता दिखाता हो।  जिसकी संवेदनशीलता में करुणा, संतुलन, धैर्य और विवेक जुड़ा हो ताकि सुख सिमट न सके और स्वार्थ फैल न सके। जो जानता हो शक्ति का सही नियोजन करना। समय के साथ निर्माण के लिए हस्ताक्षर करना। संभावनाओं को सफल परिणाम में बदलना। संकल्प तथा सपनों को पूर्णता देना। दृष्टिकोण का सम्यक् होना और भाग्यवादी न बनकर स्वयं भाग्य रचना। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमारजीआलोक ने ठाणं सूत्र का वाचन करते हुए सैक्टर 24 सी अणुव्रत भवन तुलसी सभागार मे कहे।
मनीषीसंत ने कहा शुभ के स्वप्न को अगर आकार देना है तो भगवान महावीर के इस संदेश को जीवन से जोडऩा होगा-‘खणं जाणाहि पंडिए’-हम क्षणजीवी बनें। न अतीत की चिंता, न भविष्य की कल्पना। सिर्फ ‘आज’ को जीने का अप्रमत्त प्रयत्न करें। यही हर दिन की सुबह का सच्चा स्वागत है। जिंदगी है तो चुनौतियां होंगी ही। कुछ चुनौतियों से आप आसानी से पार पा लेते हैं, पर कुछ आपसे खुद को बदलने की मांग करती हैं। कामयाबी इस पर निर्भर करती है कि आप कितने बेहतर ढंग से खुद को बदल पाते हैं? जेन मास्टर मैरी जैक्श कहती हैं, ‘अपनी उलझनों का सामना करते हुए अनजान चीजों को गले लगाना हमें विकास की ओर ले जाता है। हमें आगे बढ़ाता है।’ कोई घटना हो, व्यक्ति या फिर वस्तु, हम दो तरह से चीजों को देखते हैं। कभी हम पर प्यार का चश्मा चढ़ा होता है तो कभी डर का। लेंस बदलते ही हमारी पूरी सोच बदल जाती है। डर चीजों को एक रूप दे रहा होता है, तो प्रेम एक अलग ही धरातल। लेखिका व वक्ता गैब्रियल बर्नस्टेन कहती हैं, ‘हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं कि हमारी आंखें क्या देखती हैं? हम जिम्मेदार इस बात के लिए हैं कि उसे कैसे अपनाते हैं।’
मनीषीसंत ने अंत मे फरमाया भाग्य भागकर नहीं आता है, कर्म करने के लिए जागकर आता है अर्थात् कर्म नहीं करने से भाग्य भागकर चला जाता है। कर्म हमेशा आगे चलता है और भाग्य हमेशा पीछे चलता है। घर में बहुत सफाई के बावजूद कुछ धूल मिट्टी रह जाना स्वाभाविक है और कितना ही समझदार व्यक्ति हो उससे भूल हो जाना भी स्वाभाविक है।
सच्चा मित्र दर्पण की तरह होता है जो हमेशा वास्तविकता से रूबरू करवाता है और वह उसी तरह से साथ नहीं छोड़ता है जिस तरह से परछाई व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती है।फूड पॉइजिनिंग का इलाज संभव है लेकिन इयर पॉइजनिंग का कोई इलाज नहीं है क्योंकि कान में जहर घोलने से व्यक्ति कहीं का कहीं पहुंच जाता है उसी तरह से जिस तरह टायर में हवा भरने से टायर कहीं से कहीं पहुंच जाता है।

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