संकट जीवन को गढ़ते हैं

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Buzzing Chandigarh (Sonam) चंडीगढ, 10 जुलाई: संकट जीवन का सहचर है, वह सबके साथ चलता है। लेकिन आदमी संकट के नाम से ही घबड़ाता है। संकट का आभास होते ही वह उससे बचने के उपाय करने लगता है। लेकिन संसार में शायद ही ऐसे व्यक्ति का जन्म हुआ हो जिसने संकटों का सामना न किया हो। संकट तो जीवंत व्यक्ति का परिचय है। इसीलिए महापुरुषों ने संकट को जीवन की पाठशाला कहा है। संकट की पाठशाला में व्यक्ति जितना अधिक सबक याद करता है, वह जीवन में उतना ही सफल होता है। ये सूक्तियाँ हैं, कोरा उपदेश नहीं। संकट का मुकाबला करके नया जीवन जीने वालों के अनुभवों की पोथियाँ आशा की किरण हैं, दीपक हैं। इलेनोर रूजवेल्ट के ये शब्द प्रामाणिक एवं उपयोगी है-आखिरकार जीवन का उद्देश्य उसे जीना और इष्टतम अनुभवों को हासिल करना, नए और समृद्ध अनुभवों को उत्सुकता से और निर्भर होकर आजमाना है। इसलिए संकटों से घबराए नहीं, बल्कि अपने लिए एक नई राह बनाएं, ताकि अपने जीवन को भरपूर जी सकें। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमारजीआलोक ने सैक्टर-18सी  गोयल भवन  में कहेे।
मनीषीश्रीसंत ने आगे कहा मार्क रुदरफोर्ड बहुचर्चित लेखक थे। वे अनेक दुर्घटनाओं के शिकार हुए। एक घटना उनके बचपन के दिनों की है। एक दिन वे समुद्र के किनारे बैठे थे। दूर समुद्र में एक जहाज लंगर डाले खड़ा था। बाल-सुलभ आकांक्षा मन में आई। जहाज तक तैरकर जाने की इच्छा बलवती हो उठी। मार्क तैरना तो जानते ही थे, कूद पड़े समुद्र में और तैरकर उस स्थान तक पहुँच गए जहाँ जहाज लंगर डाले खड़ा था। मार्क ने जहाज के कई चक्कर लगाए। मन प्रसन्नता से भर गया। विजय की खुशी और सफलता के सुख से आत्मविश्वास बढ़ा। लेकिन उन्होंने वापस लौटने को किनारे की तरफ देखा तो निराशा हावी होने लगी, किनारा बहुत दूर लगा, बहुत अधिक दूर।
मनीषीश्रीसंत ने कहा मार्क ने लिखा है-मनुष्य जैसा सोचता है, उसका शरीर भी वैसा ही होने लगता है। कुविचारों के कारण मैं, एक फुर्तीला नौजवान, बिना डूबे ही डूबा हुआ-सा हो गया। लेकिन विचारों को मैंने निराशा से आशा की ओर ढकेला, तो क्षण-भर में ही चमत्कार-सा होने लगा। मैं अपने में परिवर्तन महसूस करने लगा। शरीर में नई शक्ति का संचार हो रहा था। मैं समुद्र में तैर रहा था और सोच रहा था कि किनारे तक नहीं पहुँचने का मतलब है डूबकर मरने से पहले का संघर्ष। मेरा बल मजबूत हुआ, मेरे अपने ही विचारों से, अपनी ही सोच से। मैं फिर से शक्तिमान हो गया। जैसे मुझे संजीवनी मिल गई। पहले मन में भय था और अब विश्वास किनारे तक पहुँचने की क्षमता का अहसास। मैंने संकल्प किया और अपने लक्ष्य की ओर तैरने लगा।

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