श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी का आविर्भाव दिवस मनाया गया धूमधाम से

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चंडीगढ़: Buzzing Chandigarh Nov,8:(Sonam) श्री चैतन्य गौड़ीय मठ चंडीगढ़ में उत्थान एकादशी तिथि  का पर्व एवं श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी का आविर्भाव  8 नवंबर को पूरे  भारत सहित विश्व के 25 देशों में मनाया गया।हर वर्ष आने वाला उत्थान एकादशी का पावन दिन श्री चैतन्य गौड़ीय वैष्णव समाज के लिए बहुत ही महत्व रखता है। यहाँ ये दिन चर्तुमास व्रत का पालन कर रहे भगवान के शुद्ध भक्तो की उत्थान एकादशी पर अपने प्रभु की जागरण लीला के साथ उनकी व्याकुलता को दूर करता है। उसके साथ ही यह श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु जी की परंपरा के दसवें आचार्य श्री श्रीमद भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी का प्रकट दिवस सबको आनद के समुंदर में मग्न कर देता है। महाराज जी का जन्म 18, नवंबर 1904 उत्थान एकादशी की पवित्र तिथि को प्रातः 8 बजे पूर्वी बंगाल(मौजूदा बंगला देश) फरीदपुर जिले के कांचनपाड़ा नाम के गाँव  देवी बालक के रूप में हुआ। उत्थान एकादशी चर्तुमास की समाप्ति होने पर आती है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की नींद के बाद जागते है। यह वह शुभ दिन है जो संसार में खुशियां ओर पवित्रता लाता है। इस तिथि को भगवान श्री हरि के निजजन व हमारे परमाराध्य श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी का आविर्भाव माया में फंसे सांसारिक जीवो के त्रिताप को दूर करने के लिए हुआ। बचपन से ही आप मे संसार के विषयों के प्रति उदासीन भाव था। बाल्यकाल से ही आपके हृदय की विशालता तथा ज्ञान की प्रसारता को देख अनेक लोग यह कहते थे कि अवश्य ही यह बालक भविष्य में कोई असाधारण व्यक्तित्व संपन्न पुरुष होगा। और ये बात सच साबित हुई।
श्री गुरुदेव आदर्श मातृ-भक्त थे। आपकी माता जी आपको अपने पास बिठाकर विभिन्न शास्त्र-ग्रंथो का स्वयं पाठ करती थी। नियमित रूप से पाठ करते करते आपको 11 वर्ष की आयु में सारी गीता कंठस्थ हो गयी थी। जब आप छोटे ही थे तो आपके पिता श्री निशिकांतदेव शर्मा बन्दोपाध्याय जी परलोकवासी हो गए थे। इसलिए आपका सारा बचपन अपने ननिहाल में ही बीता। आपके नाना अपने क्षेत्र के एक प्रसिद्ध व धनी व्यक्ति थे। तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने उन्हें ‘राज चक्रवती’ की उपाधि से विभूषित किया था।
 श्री गुरुदेव जी की शिक्षा कांचन पाड़ा ग्राम तथा भट्ट ग्राम  में हुई थी। एक रात श्री गुरुदेव जी ने एक एक अपूर्व स्वप्न देखा कि नारद ऋषि जी ने आकर आपको सांत्वना दी तथा मंत्र प्रधान किया और कहा कि इस मंत्र के जप से तुम्हे सबसे प्रिय वस्तु की प्राप्ति होगी। परन्तु स्वप्न टूट जाने के पश्चात बहुत चेष्टा करने पर भी वह सारा मंत्र आपको याद नही हो पाया। मंत्र भूल जाने पर आपके मन और बुद्धि में अत्यंत क्षोभ हुआ। और दुःख के कारण आप मोहित हो गए। सांसारिक वस्तुओं से उदासीनता चरम सीमा पर पहुंच गई। और आपने संसार को त्याग देने का संकल्प लिया|

 

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