प्रेम की जड़ को जीवन से कभी न कटने दे

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चंडीगढ, 12 अक्तूबर: अगर प्रेम की जड़ गहरी होने की वजह कटती चली जाए तो जीवन कितना अकेला और असहनीय होता चला जाएगा. उनने बच्चों को होशियार, चतुर, चांद पर जाने लायक बनाने की भरपूर कोशिश की लेकिन इस प्रक्रिया में स्नेह की जो चूक हुई, उसने एक हरे-भरे, लहलहाते जीवन को सुखद आत्मीयता की जगह कहीं अधिक कैक्टस और कंटीली झाडिय़ों से भर दिया। उनके बच्चों ने क्या चुना?  इससे अधिक कहीं जरूरी बात यह है क्यों चुना? शायद, इसलिए क्योंकि वह उस सहज, सरल , स्नेहिल प्रेम की तलाश में थे जो उन्हें अपने घर, पिता से मिलना चाहिए था, लेकिन नहीं मिला. तो वह बाहर खोजने निकल गए…यह सब कल की बातें हैं, हमें तो बस यह देखना चाहिए कि कहीं हम आज भी तो वही नहीं कर रहे ! ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमारजीआलोक ने सैक्टर 24सी अणुव्रत भवन तुलसीसभागार मे सभा को संबोधित करते हुए कहे।
मनीषीसंत ने आगे कहा श्रेष्ठ में भी श्रेष्ठ वह है, जिसने अपना चरित्र हमेशा मजबूत रखा। जो बुराई से विचलित होकर डिगा नहीं। इसलिए कहा जाता है कि सदैव अपने चरित्र पर डटे रहो। एक दिन तुम्हारा चरित्र अवगुणों को भी बदल देगा। यह प्रक्रिया धीमी है, मगर पहले ही दिन से शुरू हो जाती है। उत्तम चरित्र यदि अडिग है, तो उसने बदलाव किए हैं। जिस बुराई से भागते हो, जिसे पसंद नही करते, जो तुम्हारे चरित्र का हिस्सा नहीं है, उसे अपने में कभी मत उतारो। हर बुराई, हर विपरीत से अपने ही चरित्र से लड़ो।
मनीषीसंत ने कहा हर क्षण में विचार के बजाय जिंदगी जीने का फैसला करना ही ज्ञान है और सोचना इस क्षण को गंवा देने की तरह होगा। ज्ञान हासिल हो जाने का मतलब यही है कि हम हर क्षण को पूरी सजगता से जिएं। आने वाले क्षण के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं है। वह आ भी सकता है और नहीं भी। आप जो संतुष्टि हासिल करते हैं वह सच्ची संतुष्टि है। ऐसी संतुष्टि जो आती है और चली जाती है वह सच्ची संतुष्टि नहीं हो सकती है। यह तो दो दुखद स्थितियों के बीच की स्थिति है। हमें इस परिभाषा को समझना चाहिए कि कोई भी चीज जो आकर बनी रहती है वही सचाई है। हमें ज्ञान शब्द से घबराना नहीं चाहिए। आप इसे क्या कहते हैं यह मायने नहीं रखता है। आप इसे आनंद की अवस्था भी कह सकते हैं। आप इसे चाहे जो भी कहें। लेकिन आपको यह याद रखना चाहिए यह केवल शुरुआत है इसका कोई अंत नहीं है।

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