दूसरो के बाहरी नही बल्कि अंदरूनी गुणों को देखे:

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चंडीगढ़, 9 सिंतबर सभी तरह की हिंसा की जड़ की तलाश करें तो पाएंगे कि बच्चों को महत्वाकांक्षी बना दिया जाना ही उसके मूल में है। हमारी शिक्षा व्यवस्था प्रेम और ध्यान जैसे तत्वों पर आधारित ही नहीं रही बल्कि उसमें महत्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा आ बैठी है। यह कितना बुरा है? तुलना के कारण ही हमारे मन में तुच्छ और श्रेष्ठ होने के भाव आते हैं। जब हम तुलना ही नहीं करते तो सभी एक जैसे हैं। तब हम जो होते हैं बस वह होते हैं। हम किसी से श्रेष्ठ या कमजोर नहीं होते। हमें इस दुनिया में अगर चांद की जरूरत है तो घास की भी जरूरत है। हमें बुद्ध की वाणी और एक कोयल की वाणी दोनों की जरूरत है। तभी यह संसार पूरा होता है। हमारी दुनिया भी इसी तरह है कि हम तुलना में बहुत कुछ गंवा देते हैं जबकि हमें यह सोचना चाहिए कि हमारी जो भूमिका है उसमें रहते हुए आनंद की ओर बढ़ें। मुझे भी लगता है कि अगर हम अपने भीतरी गुणों की तरफ ज्यादा ध्यान दें तो हमारी बहुत सारी समस्याओं का हल तो निकल ही आएगा बल्कि कहना चाहिए कि तब हमारी समस्याएं भी समस्याएं नहीं रहेंगी। आज का दौर सिर्फ बाहरी वस्तुओ व बाहरी इंसान की बनावट देखकर अंदाजा लगाने वाला बन गया है। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमार जी आलोक ने अणुव्रत भवन सैक्टर-24 तुलसी सभागार में सभा को संबोधित करते हुए कहे।
मनीषीसंत ने अंत मे फरमाया सभी तरह की हिंसा की जड़ की तलाश करें तो पाएंगे कि बच्चों को महत्वाकांक्षी बना दिया जाना ही उसके मूल में है। हमारी शिक्षा व्यवस्था प्रेम और ध्यान जैसे तत्वों पर आधारित ही नहीं रही बल्कि उसमें महत्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा आ बैठी है। यह कितना बुरा है? आज के समय में प्रतिस्पर्धा को आगे बढऩे के लिए बेहद जरूरी माना जाता है। कहते हैं कि प्रतिस्पर्धा ही चीजों को बेहतर बनाती है। लेकिन यह एक बड़ा भ्रम है। असल बात तो यह है कि किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा स्वस्थ नहीं होती है बल्कि वह तो हमारी चेतना के लिए कैंसर की तरह होती है। दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा करना अपना ही नुकसान करने की तरह है। सही तरीका तो यही है कि आप अपने गुणों के साथ बने रहें। अपने भीतर किसी भी तरह का प्रतिरोध पैदा नहीं करें।
2 दिवसीय आचार्य भिक्षु चरम कल्याणक दिवस 11 को
मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमारजीआलोक के सानिध्य में  217वां आचार्य भिक्षु चरम कल्याणक दिवस 11 सिंतबर को  जिसमे सामुहिक जप 9 से 10 और 13 घंटे का अनुष्ठान प्रात 6 से शाम: 7 बजे तक होगा।

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