जीवन को हर रोज नया अर्थ दे: मनीषीसंत मुनिश्रीविनयकुमार जी आलोक

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Buzzing Chandigarh (Poonam) चंडीगढ, 13 जुलाई:इंसान का अपना प्रिय जीवन-संगीत टूट रहा है. वह अपने से, अपने लोगों से और प्रकृति से अलग हो रहा है. उसका निजी एकांत खो रहा है और रात का खामोश अंधेरा भी. इलियट के शब्दों में, ‘‘कहां है वह जीवन जिसे हमने जीने में ही खो दिया.’’ फिर भी हमें उस जीवन को पाना है जहां इंसान आज भी अपनी पूरी ताकत, अभेद्य जिजीविषा और अथाह गरिमा और सतत पुरुषार्थ के साथ जिंदा है। इसी जिजीविषा एवं पुरुषार्थ के बल पर वह चांद और मंगल ग्रह की यात्राएं करता रहा है. उसने महाद्वीपों के बीच की दूरी को खत्म किया है. वह अपनी कामयाबियों का जश्न मना रहा है फिर भी कहीं-न-कहीं इंसान के पुरुषार्थ की दिशा दिग्भ्रमित रही है कि मनुष्य के सामने हर समय अस्तित्व का संघर्ष कायम है। जब हम अपनी ही सोच और क्षमताओं पर संदेह करने लगते हैं तब अंधेरा घना होता है. तभी लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता. लेखिका एलेक्जेंड्रा फ्रेन्जन कहती हैं, ‘अगर दिल धडक़ रहा है, फेफड़े सांस ले रहे हैं और आप जिंदा हैं तो कोई भी भला, रचनात्मक और खुशी देने वाला काम करने में देरी नहीं हुई है। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमार जी आलोक ने अणुव्रत भवन तुलसीसभागार मे कहे।
मनीषीसंत ने आगे कहा आज पूरी दुनिया में उथल-पुथल का दौर चल रहा होता है, ऐसी स्थितियों में  अक्सर लोग लक्ष्य को पाने की आस छोड़ देते ुहैं. उनका सारा ध्यान महज अपने अस्तित्व को बचाए रखने में लग जाता है. लक्ष्य का होना जीवन को स्पष्टता देता है. अच्छी खबर यह है कि आप बंधी-बंधाई सुरक्षित राहों के इतर राह चुनते हैं तो उन अवसरों पर सोचना भी आसान हो जाता है, जो आपको मुश्किल लगती थीं।परिवर्तन की इस संधि-बेला में, इस भूमण्डलीकरण, आर्थिक आजादी और आक्रामकता के दौर में एक ऐसी मानवीय संरचना की आवश्यकता है जहां इंसान और उसकी इंसानियता दोनों बरकरार रहे. इसके लिये मनुष्य को भाग्य के भरोसे न रहकर पुरुषार्थ करते रहना चाहिए. पुरुषार्थ कभी व्यर्थ नहीं जाता बल्कि सफलता का सूत्रधार है पुरुषार्थ. इसके लिये जरूरी है आप हर रोज अपने सपनों के बारे में सोचें और उनको आकार देने के लिये तत्पर हो।

मनीषीश्रीसंत ने कहा  हालांकि इस संघर्ष और विश्वास से उसको नयी ताकत, नया विश्वास और नयी ऊर्जा मिलती है और इसी से संभवत: वह स्वार्थी बना तो परोपकारी भी बना. वह क्रूर बना तो दयालु भी बना, वह लोभी व लालची बना तो उदार व अपरिग्रह भी बना. वह हत्यारा और हिंसक हुआ तो रक्षक और जीवनदाता भी बना।

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