चरित्र शुद्धि के लिए संस्कार अवश्यक:

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चंडीगढ़, 22  सिंतबर बिना ज्ञान के, बिना सही तरह की समझ के, बिना अपनी अक्ल को खोले, बस भावना के मार्ग पर चलते जाने से मतिभ्रम जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। यह बहुत सुंदर, सुखद, परमानन्द जैसी लग सकती है, लेकिन यह एक ठहराव ला सकती है। दूसरी तरफ, भक्ति के बिना, भावना के बिना, योगिक अभ्यास बस बंजर, रूखे, बेजान हो जाते हैं। बिना भक्ति के स्पर्श के, आपका ज्ञान अक्सर बाल की खाल निकालना बन जाता है। तो अगर आप खुद के भीतर ज्ञान और भक्ति का सही मेल पैदा कर लेते हैं, तो इसके सटीक कॉकटेल से आपकी आध्यात्मिक यात्रा बहुत तेजी से आगे बढ़ सकती है।   चरित्र शुद्धि  या नैतिकता इनके साथ अर्थ का सबंध जुडा हुआ है। कोई भी व्यक्ति अनैतिक क्यों होता है इस पर गहराई से सोचा जाना चाहिए। संत तुलसीदास ने कहा भुखे भजन ना होये गोपाला यानि भूखा व्यक्ति भजन ही नही कर सकता। जब रोटी नही है तो पहले वह रोटी का प्रबंध करेगा। अणुव्रत आंदोलन जो कार्य कर रहा है जैसा मुझे ज्ञात हुआ वह बहुत ही प्रंशनीय है क्योकि ऐसे आंदोलनों के बिना देश की आने वाली पीढी संस्कार रहित होने का भी खतरा है। संस्कृति के संस्कार अवश्यक है बचपन से ही संस्कारो की धरोहर बच्चों को मिल जानी चाहिए। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमार जी आलोक ने अणुव्रत भवन सैक्टर-24 तुलसी सभागार में रविवारिय जनसभा को संबोधित करते हुए कहे।
मनीषीश्रीसंत ने अंत मे फरमाया सही मायने में ज्ञान-योग के मार्ग पर चलने के लिए चंद लोगों के पास ही जरूरी बुद्धि होती है। ज्यादातर लोगों को भारी मात्रा में तैयारी की जरूरत होगी। बुद्धि को छुरी जैसी पैनी बनाने के लिए एक पूरी पद्धति होती है जिससे कि उस पर कुछ भी न चिपके। इसमें बहुत वक्त लगता है, क्योंकि मन बड़ा मारक होता है। वह लाखों तरह के भ्रम पैदा कर देगा। कुछ ही लोग इसकी साधना सही तरीके से कर पाते हैं। उन्हें ब्रह्मांड की व्यवस्था, आत्मा की लंबाई-चौड़ाई और इसके आकार में भी विश्वास है। उन्होंने ये सारी बातें किताबों में पढ़ी है। यह ज्ञान-योग नहीं है। किसी चीज के बारे में आपकी जानकारी, जो आपके लिए जीता-जागता अनुभव नहीं है, एक शुद्ध कचरा है। हो सकता है कि वह बहुत पवित्र कचरा हो, लेकिन वह आपको मुक्त नहीं करता, वह आपको सिर्फ उलझाता है।

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