आचार्य भिक्षु के कठोर संयम, अडिग धैर्य के समक्ष विरोधी नतमस्तक हो गये:

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Buzzing Chandigarh (Poonam) चंडीगढ 13 सिंतबर: आचार्य भिक्षु ने समानता, सहस्तित्व और सहयोग के सिद्धांतों को अपने धर्म संघ में क्रियान्वित किया। उन्होंने धर्म को धर्मस्थानों से बाहर निकालकर जीवनगत बनाने के सूत्र दिए। भिक्षु क्षमता के प्रतीक थे। छोटे और बड़े जीवों को वे समान मानते हैं। लगभग 8 वर्ष तक वे अपने गुरु के सानिध्य में रहे। उस समय आचार की शिथिलता का बोलबाला था। अनेक जैन साधू पथ भ्रष्ट हो रहे थे। मर्यादा से अधिक वस्त्र रखते थे, अधिक सरस आहार लेते थे तथा शिष्य बनाने के लिए आतुर रहते थे। गरीब, निरीह, कमजोर, आदि को मारकर अमीर और ताकतवर का पोषण करने को उन्होंने अधर्म बताते हुए कहा- राकां ने मार झींका न पोसे, ते बात घणी छ: गैरी। 1803 ई में ग्राम सिरियारी, जिला पाली में उन्होंने समाधिमरण प्राप्त किया। सिरियारी ग्राम जहाँ आचार्य भिक्षु का अंतिम संस्कार हुआ था, राजस्थान का लोकतीर्थ बन गया हैं। उस दौरान जोधपुर के दीवान फतहमल सिंघी गुजर रहे थे। उनसे हुई चर्चा में 13 श्रावक व 13 साधु के योग को देखकर उन्हें तेरापंथी कहकर पुकारा। इस पर विरोधी लोगों ने भीखण जी/आचार्य भिक्षु के अनुयायियों को तेरापंथी कहकर चिढाना आरम्भ कर दिया किन्तु भीखणजी ने इस नामकरण को तुरंत स्वीकार कर लिया और कहा हे प्रभो यह तेरा पन्थ है इसमे मेरा कुछ नही है। । हम सब निभ्र्रान्त होकर इस पंथ पर चलने वाले है, अत: हम तेरापंथी ही है। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमारजीआलोक ने 2 दिवसीय आचार्य भिक्षु चरम कल्याणक दिवस के अंतिम दिन अणुव्रत भवन सैक्टर 24सी तुलसीसभागार मे कहे।
मनीषीसंत ने आगे कहा  मर्यादाएं राष्ट्र का जीवन-रक्त है। सच पूछा जाए तो अनुशासन ही मानव सभ्यता के विकास की पहली सीढ़ी है, जिसके सहारे हमारा क्रमिक विकास संभव हुआ है। प्रकृति के समस्त कार्य-व्यापार किसी न किसी नियम से बंधे होते हैं। पृथ्वी नित्य नियम से अपनी धुरी पर घूमती है, जाड़ा, गरमी और बरसात सदैव समय पर आया करते हैं। अनुशासन दो शब्दों से मिलकर बना है- अनु और शासन। अनु उपसर्ग है जो शासन से जुड़ा है और जिससे मर्यादा शब्द निर्मित हुआ है। जिसका अर्थ है- किसी नियम के अधीन रहना या नियमों के शासन में रहना। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मर्यादा आवश्यक है। पारिवारिक और सामाजिक जीवन में तो कहीं ज्यादा मर्यादाएं की आवश्यकता होती है। यदि मर्यादा का पालन नहीं किया जाए, तो जीवन उच्छृंखल बन जाएगा। हम इतिहास व पुराण उठाकर देखें, तो हमें इसके अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जहां मर्यादा से महत्वपूर्ण सफलताएं और उपलब्धियां हासिल हुई हैं। ये उपलब्धियां हमारे लिए प्रेरणा का प्रबल स्तंभ बनीं। आज जीवन की आपाधापी बढ़ गई है, लोग कम समय में अधिक से अधिक सफलताएं प्राप्त कर लेना चाहते हैं। वह येन-केन-प्रकारेण ढंग से लक्ष्य प्राप्ति के लिए दौड़ते रहते हैं। वे मर्यादाएं का पालन करना जरूरी नहीं समझते, लेकिन इसके विपरीत सच्चाई यह है कि जहां जितना अच्छी मर्यादाएं है,

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