आचार्यश्री महाप्रज्ञ एक युग का नाम:

0
51
चंडीगढ, 21 जुलाई: आचार्यश्री महाप्रज्ञ एक युग का नाम है, राजस्थान के छोटे से ग्राम टमकोट मे श्री तोलाराम एंव श्रीमती बालू के घर बालक नयमल का जन्म 14 जून, 1920 को हुआ। मात्र 10 वर्ष की अवस्था में ही मुनि जीवन के कांटो भरे सफर पर चलना स्वीकार किया। बालक नथमल ने अपनी माता के साथ पूज्य कालूगणी जी दीक्षा ग्रहण की। अपनी सौभ्य आकृति एंव निश्छल स्वभाव के कारण यह बालक सबका प्रिय बन गया। श्री कालूगणी जी के निर्देश पर उन्होने विद्यागुरू के रूप मे आचार्य श्री तुलसी का सानिध्य मिला। बालक मुनि नथमल की अदभुत मेधा शक्ति से उन्हे दर्शन, न्याय, व्याकरण, मनो विज्ञान, ज्योतिष एवं आयुर्वेद आदि विषयों में विशेषज्ञता मिली। जैनागमों के गंभीर अध्ययन किया। राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने आचार्य श्री को दूसरे विवेकानंद की संज्ञा दी। महान संत आचार्य श्री ने धार्मिक एंव बौद्धिक जगलत के बीच नये क्षितिज उद्घाटित किए तथा एक प्रतिष्ठित संत के रूप मे 20वीं शताब्दी के अध्यात्म के प्रतीक बनकर उभरे। आपकी असाधारण प्रतिभा ने धार्मिक क्षेत्र में पूर्णतया नया सिद्धांत दिया। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमारजीआलोक ने आचार्य श्री महाप्रज्ञ जन्मशताब्दी वर्ष पर महाप्रज्ञ का सार्वजनिक जीवन संगोष्ठी को संबोधित करते हुए सैक्टर 24सी अणुव्रत भवन तुलसीसभागार मे कहे।
मनीषीसंत ने कहा आचार्यश्रीमहाप्रज्ञ किसी पहचान के मोहताज नही है, उन्हे समय समय पर अनेको पुरस्कारो से सम्मानित किया गया जिनमे अमेरिकन बायोग्राफी इस्टीटयूट ने उन्हे मैन ऑफ द ईयर, 23 अक्टूबर 1999 को नीदरलैड इंटर कल्चरल ओपन युनिवर्सिटी ने साहित्य के लिए डी.लिट् उपाधि से सम्मानित किया। मानवता के क्षेत्र में महाप्रज्ञ की अनगिनत एवं उल्लेखनीय सेवाओं एवं योगदानों के संदर्भ में उन्हें युगप्राधान पद से सम्मानित किया गया। यह पद उन्हें 1995 में दिया गया। इसी तरह रिलीब्युज एंड इन्टरनैशनल फेडरनेशन  फॉर ब्लर्डपीस, लंदन ने उन्हे अंबेसडर फॉर पीस, इंदिरा गांधी नेशनल अवार्ड कमेटी, नई दिल्ली ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार दिया। इसके अलावा आचार्यश्री महाप्रज्ञ को ढेर सारे अंलकरणो और सम्मानों से नवाजा गया। शोध विद्धानों के लिए  आचार्य श्री महाप्रज्ञ एक विश्वकोष है। मानवता के क्षेत्र में महाप्रज्ञ जी की अनगिनत एंव उल्लेखनीय सेवाओं, एवं योगदान के संदर्भ मे उन्होंने युग प्रधान युग से 1995 मे सम्मानित किया।  आत्मा मेरा ईश्वर है ।  त्याग मेरी प्रार्थना है, मैत्री मेरी भक्ति है ।  संयम मेरी शक्ति है।  अहिंसा मेरा धर्म है – इस शब्दों में अपने भावात्मक व्यक्तित्व का परिचय देने वाले आध्यात्म योगी आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी आत्म-मंगल एवं लोक-मंगल के लिए समर्पित संत थे।  अणुव्रत आन्दोलन के प्रवर्तक, आचार्यश्री तुलसी के उत्तराधिकारी और तेरापंथ के दशम अधिशास्ता आचार्यश्री महाप्रज्ञ महान दार्शनिक एवं मौलिक संत थे ।  उनके द्वारा सृजित तीन सौ से अधिक जीवन-स्पर्शी ग्रन्थ उनकी ऋतम्भरा प्रज्ञा तथा मानवीय, जागतिक समस्याओं के सूक्ष्म विश्लेषण एवं समाधायक प्रतिभा के जीवंत प्रमाण हैं।  उनके द्वारा अनूदित और शोधपूर्ण संपादित जैन आगम प्राच्यविद्या की अनमोल निधि हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here